राष्ट्रपति से पुरस्कृत विद्यालय की चौखट पर ठिठकता भविष्य: तुलसीपुर में ‘शिक्षा के अधिकार’ की हार
भागलपुर जिले के खरीक प्रखंड का तुलसीपुर गांव आज एक अजीबोगरीब संकट से जूझ रहा है। एक तरफ गांव का गौरव है—वह विद्यालय जिसे उत्कृष्ट शैक्षणिक वातावरण और प्रबंधन के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। दूसरी तरफ वह कड़वी हकीकत है, जहाँ इसी गांव के बच्चे नौवीं कक्षा में नामांकन के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। यह स्थिति न केवल हैरान करने वाली है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न भी खड़ा करती है।
पुरस्कार का गौरव बनाम जमीनी संघर्ष:
तुलसीपुर का यह विद्यालय कभी जिले के लिए मिसाल हुआ करता था। राष्ट्रपति से पुरस्कार मिलना इस बात का प्रमाण था कि यहाँ का प्रशासन और शिक्षण कार्य उच्च कोटि का है। लेकिन आज उसी ‘आदर्श’ स्कूल में गांव के ही छात्रों को दाखिला न मिलना प्रबंधन की कार्यशैली पर सवाल उठाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि उनके बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा है जबकि उसके बाप दादा ने कीमती जमीन दान सिर्फ इसलिए किया था उसके गांव के बच्चों को पढ़ाई के लिए बाहर नहीं जाना पड़े।
प्रशासन की चुप्पी और ग्रामीणों का आक्रोश:
नामांकन से वंचित छात्र और उनके परिजन पिछले कई दिनों से विद्यालय और अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। हार मानकर ग्रामीणों ने जिला पदाधिकारी (DM) से भी न्याय की गुहार लगाई है। लेकिन जब सरकारी तंत्र से आश्वासन के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ, तो अब ग्रामीणों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। गांव वालों का स्पष्ट कहना है कि यदि उनके बच्चों का भविष्य इसी तरह अधर में लटका रहा, तो वे विद्यालय में तालाबंदी करने को मजबूर होंगे। और जब तक गांव के बच्चों का एडमिशन नहीं होगा तब तक दूसरे जगह के छात्रों का भी एडमिशन नहीं करने दिया जाएगा।
