महिला आरक्षण मात्र एक ढ़कोसला, छलावा या ढोंग👉🏻
महिला आरक्षण ‘शक्ति’ का उदय या ‘सांसद-पति’ संस्कृति का आगाज ? 🗳️🚩
संसद में महिला आरक्षण बिल को लेकर चल रही राजनैतिक उठापटक के बीच एक बड़ा सवाल मेरे मन में कौंध रहा है। एक तरफ हम महिलाओं को 33% भागीदारी देने की बात कर रहे हैं, जो कि एक स्वागत योग्य कदम है लेकिन क्या हम उस ज़मीनी हकीकत के लिए तैयार हैं जिसे हम अक्सर अपनी पंचायतों और नगर निगमों में देखते आ रहे हैं ?
डर यह है कि ‘मुखिया-पति’ के बाद अब देश में ‘सांसद-पति’ और ‘विधायक-पति’ ‘मेयर पति’ की एक नई खेप न तैयार हो जाए।🧐
अक्सर देखा जाता है कि जब सीट आरक्षित होती है तो ‘साहब’ अपनी पत्नी को चुनाव लड़ा देते हैं। चुनाव जीत भी जाते हैं, पर पावर का ‘रिमोट कंट्रोल’ पति देव की जेब में ही रहता है। मैडम केवल कभी कभार पंचायत भवन यूं ही घूम टहल आती है जैसे लगता कि नैहर जा रही है या कभी कभार किसी उद्घाटन स्थल तक लेकिन मैडम साहिबा सिर्फ़ फाइलों पर दस्तखत तक ही सीमित रह जाती हैं और पीछे खड़े उनके पति देव ही असली मुखिया’ ‘मेयर’, ‘विधायक’ या सांसद बनकर शासन चलाते हैं।
एक फौजी नजरिए से जब देखा जाय तो__
सेना में ‘Chain of Command’ से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है क्योंकि वहां जिसकी वर्दी पर रैंक होती है , फैसले और जिम्मेवारियां भी उसी की होती है ।
क्या हम राजनीति में ऐसी महिलाओं को आगे नहीं ला सकते जो अपने फैसले खुद लें ? जो किसी ‘प्रॉक्सी’ की तरह नहीं बल्कि एक संजीदा ‘लीडर’ की तरह पंचायत , निगम, विधानसभा या लोक सभा में गरजें ?
आरक्षण का असली मकसद तब पूरा होगा जब महिला प्रतिनिधि केवल एक ‘संवैधानिक चेहरा’ न होकर एक ‘स्वतंत्र आवाज’ होनी चाहिए । हमें ‘नाम’ की नहीं, ‘काम’ की नेता चाहिए
क्या हम वाकई आधी आबादी को सशक्त कर रहे हैं या सिर्फ पुरुषों की सत्ता बचाने के लिए महिलाओं को एक ‘राजनैतिक ढाल’ बना रहे हैं ?
“आरक्षण का इंतज़ार: क्या 33% का आंकड़ा बदलेगा महिलाओं की जमीनी हकीकत?”
महिला आरक्षण मात्र एक ढ़कोसला, छलावा या ढोंग👉🏻महिला आरक्षण ‘शक्ति’ का उदय या ‘सांसद-पति’ संस्कृति का आगाज ? 🗳️🚩 संसद में महिला आरक्षण बिल को लेकर चल रही राजनैतिक उठापटक के बीच...
April 19, 2026
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